१.जंग के मैदान बन गए हैं नगर
अब जंग मैदानों में नहीं होती
नशा गुरुर अब सत्ता की गलियों में चलता है
नशे की आजमाईश अब मयखानों में नहीं होती
२. रास्ता भटके लोगों को राह दिखानी पड़ती है
अत्याचार मिटाने को बन्दूक उठानी पड़ती है
ठीक समय पर सत्रु पर जो प्रहार नहीं करते
इतिहासों में पढ़ लो उनको मुंह की खानी पडती है
-संतोष शाक्य
अब जंग मैदानों में नहीं होती
नशा गुरुर अब सत्ता की गलियों में चलता है
नशे की आजमाईश अब मयखानों में नहीं होती
२. रास्ता भटके लोगों को राह दिखानी पड़ती है
अत्याचार मिटाने को बन्दूक उठानी पड़ती है
ठीक समय पर सत्रु पर जो प्रहार नहीं करते
इतिहासों में पढ़ लो उनको मुंह की खानी पडती है
-संतोष शाक्य
0 Comments